जानें परीकर के ऐसे ही अनजाने पहलू
लंबी बीमारी के बाद गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर परींकर का निधन हो गया। उनके निधन से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। सत्ता पक्ष के साथ विपक्ष ने उनकी सादगी, काम के प्रति समर्पण और ईमानदारी को याद किया। स्वयंसेवक संघ के प्रचारक से देश के रक्षा मंत्री तक का सफर करने वाले मनोहर पर्रोकर काजल की कोठरी (राजनीति) में रहकर भी बेदाग रहने वाले शख्सियत थे। उनकी छवि राजनीति में मिस्टर क्लीन की थी।गोवा की उथल-पुथल भरी राजनीति में वह हमेशा आम आदमी ही बने रहे। आइए आपको बताते हैं, उनसे जुड़ी कुछ और बातें... मनोहर पर्राकर का नाता भारत के गोवा राज्य से है और इनका जन्म इस राज्य के मापुसा गांव में साल 1955 में हुआ था। उनका पूरा नाम मनोहर गोपालकृष्णन प्रभु पर्रिकर था। उनके पिता का नाम गोपाल कृष्ण परींकर और माता का नाम राधा बाई परींकर है। वहीं इस राज्य के लोयोला हाई स्कूल से उन्होंने अपनी शिक्षा हासिल की थी। अपनी 12वीं की पढाई खत्म करने के बाद उन्होंने मुंबई में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में दाखिला लिया था और यहां से उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी। वहीं परौंकर को हिंदी और अंग्रेजी भाषा के अलावा मराठी भाषा भी बोलनी आती थी। परींकर शुरू से ही संघ से जुड़े रहे। बॉम्बे आइआइटी से इंजीनियरिंग करने के बाद भी संघ से उनका नाता बना रहा। उन्होंने संघ से जुड़ाव को कभी छिपाया भी नहींवह संघ के सालाना संचलन कार्यक्रम में भी भाग लेते थेखाकी हाफ पैंट की वर्दी और लाठी के साथ वो फोटो भी शेयर करते थे। उनके रक्षा मंत्री रहते हुए जब गुलाम कश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइक हुआ था, तब उन्होंने इसका श्रेय संघ की शिक्षा को ही दी थीमनोहर पर्राकर देश के ऐसे पहले मुख्?यमंत्री थे जिन्होंने आइआइटी इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी ।उन्होंने 1978 में बॉम्बे आइआइटी से मेटलर्जिकल ट्रेड से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की थी। आइआइटी से पढ़ाई के दौरान ही मनोहर परींकर ने यह तय किया था कि वे मशीनों के बीच उलझने के बजाए सामाजिक क्षेत्र में काम - - - करेंगे। मापसा में आरएसएस से जुड़ाव के दौरान पर्रिकर का राजनीति में आने का कोई इरादा नहीं था1984 में जब पहली बार चुनाव लड़ने का ऐलान किया तो उनका परिवार परेशान हो गया और आखिरी वक्त तक उनसे चुनाव से हटने को कहता रहा और अंतत- पार्टी की रणनीति के तहत उन्होंने उम्मीदवारी वापस भी ली। परीकर की चुनावी राजनीति की शुरुआत 1994 में हई, जब भाजपा के टिकट पर वह पणजी से विधायक चुने गए। वह जून से नवंबर, 1999 के बीच गोवा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे थे। पहली बार वह 24 अक्टूबर, 2000 को गोवा के मुख्यमंत्री बने । लेकिन उनका यह कार्यकाल 27 फरवरी, 2002 तक ही रहा।5 जून, 2002 को वह दोबारा चुने गए और एक बार फिर मुख्यमंत्री बने। पर्रिकर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को वर्ष 2014 में पार्टी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीवार घोषित करने के शुरुआती पैरोकारों में से एक थे। वर्ष 2013 में पर्रिकर ने भाजपा के राष्टीय नेतृत्व को राष्टीय कार्यकारिणी के लिए गोवा आमंत्रित किया और खुलकर उनका समर्थन किया। परींकर के गोवा के मुख्यमंत्री बनने के कुछ समय बाद उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई थी2001 में मेधा परींकर की कैंसर की वजह से मौत हो गई। उनकी शादी 1981 में हुई थी। परींकर के दो बच्चे हैं। परीकर के दो बेटे हैं। एक उत्पल और दूसरा अभिजात परीकर। उत्पल ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में यूएस की मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है। जबकि, अभिजात बिजनेसमैन हैं। उत्पल ने उमा सरदेसाई से प्रेम विवाह किया थाउमा ने यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया से पढ़ाई की है। इनका एक बेटा है, जिसका नाम धव है। अभिजात परीकर की शादी 2013 में हुई थी। उनकी पत्नी साई फार्मासिस्ट हैं। ये परीकर की सादगी ही थी कि भाजपा के साथ ही दूसरे दलों के नेता भी उन्हें पसंद करते थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वह अपने लंबरेटा स्कूटर से मुख्यमंत्री कार्यालय के लिए निकल जाया करते थे। हाल ही में लंबरेटा स्कूटर की जगह स्कूटी ने ले ली थी। गोवा में उनकी पहचान स्कूटी वाले सीएम के तौर पर थी। वहीं हाफ बाज की शर्ट उनका ट्रेडमार्क बन गई थी। कांग्रेस के वर्चस्व वाले गोवा में भाजपा की नींव जमाने का श्रेय भी परीकर को ही जाता है ।रांची पहाड़ी पर 23 जनवरी की वह तारीख और समय अद्भुत था। 10.36 मिनट पर यहां परींकर ने विश्व के सबसे बड़े तिरंगे को फहराया था। तब वह देश के रक्षामंत्री थे। हिमालय से भी करोड़ों साल पुरानी पहाड़ी पर तिरंगा लहराने का श्रेय उन्हें गया। परीकर की सेहत 2018 से खराब रहने लगी थी। पिछले साल फरवरी में उन्हें मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां पैंक्रियाटिक बीमारी का पता चला। इसके बाद उनका इलाज अमेरिका में हुआ। अमेरिका से लौटने के बाद उन्होंने 19 जुलाई से 3 अगस्त, 2018 तक विधानसभा के मानसून सत्र में भाग लिया। उसके बाद एक बार चेकअप के लिए अमेरिका गए। पिछले साल उन्हें दिल्ली के एम्स में भर्ती कराया गया था63 वर्षीय परीकर पिछले एक साल से पैंक्रियाटिक कैंसर से जूझ रहे थे। पैंक्रियाटिक कैंसर बहुत ही गंभीर बीमारी है। यह कैंसर का ही एक प्रकार है। अग्?नाशय में कैंसरयुक्त कोशिकाओं से इसकी शुरूआत होती है। यह 60 वर्ष से आधिक उम्र वालों लोगों में पाया जाता है। महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में अधिक पाया जाता है। रेड मीट और चर्बीयुक्त आहार से इसका खतरा बढ़ जाता है। मनोहर पर्रिकर चार बार गोवा के मुख्यमंत्री रहे, उन्हें आधुनिक गोवा का निर्माता कहा जाता है। पर्रिकर 24 अक्तूबर 2000 में पहली बार गोवा के सीएम बने, लेकिन कार्यकाल 27 फरवरी 2002 तक ही चलाइस छोटे कार्यकाल में हासिल लोकप्रियता के बलबूते वे भाजपा को सत्ता में लेकर आए और 5 जून, 2002 को फिर से सीएम चुने गए। भाजपा को 2007 में दिगम्बर कामत के नेतृत्व वाली कांग्रेस के हाथों हार का सामना करना पड़ा, लेकिन पर्रिकर पर पार्टी और जनता का भरोसा बना रहा। वर्ष 2012 राज्य में भाजपा को 40 में से 21 सीटों पर जीत मिली और वह फिर मुख्यमंत्री बने। पर्रिकर की शख्सियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बेहद बीमार होने के बाद भी गोवा में 2019-20 का बजट पेश करने विधानसभा पहुंचे। इस दौरान उन्होंने बेहद आत्मविश्वास से कहा था, मैं जोश में भी हं और होश में भी हूं। उनके इस जोश पर सत्ता पक्ष ही नहीं विपक्ष ने भी खड़े होकर अभिवादन किया। गोवा के मुख्यमंत्री होने के बाद भी पर्रिकर ने अपने रहन-सहन में जरा भी बदलाव नहीं किया। कहा जाता है कि वो अपने राज्य की विधानसभा खुद स्कूटर चलाकर जाया करते थे। इतना ही नहीं उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद भी अपने घर को नहीं छोड़ा और सरकार द्वारा दिए गए घर में नहीं गए। गोवा के मुख्यमंत्री रहते हुए एक दफा उन्होंने अपने जन्मदिन पर खर्च होने वाले पैसे को चेन्नई रिलीफ फंड में भेजने की अपील की थी। वह सोशल मीडिया के जरिए भी लोगों से जुड़े रहते है और उनकी मदद करते थे। 2017 में जब गोवा में भाजपा को बहुमत नहीं मिला तो यह पर्रिकर की लोकप्रियता ही थी कि छोटे दल उनके नाम पर साथ आने को तैयार हो गए। वह मार्च 2017 में राज्य लौटे और गोवा फॉरवर्ड पार्टी एवं एमजीपी जैसे दलों को गठबंधन सहयोगी बनाने में कामयाब रहे। राज्य में फिर भाजपा की सरकार बनी। यह उनकी सबको साथ लेकर चलने की नेतृत्व शैली ही थी कि बीमारी के बावजूद पार्टी नेताओं और गठबंधन के सहयोगियों का भरोसा उन पर बना रहा पिछले दिनों जब गंभीर बीमारी के बावजूद परीकर पणजी में मांडवी नदी पर पुल का निरीक्षण करने पहुंचे थे तो उसकी फोटो हर जगह वायरल हुई थी। लोगों ने उनकी जिवटता को सलाम किया था गोवा की राजनीति में 26 फीसदी आबादी वाले कैथोलिक समुदाय का काफी प्रभाव रहता है। लेकिन हिंदू होने के बावजूद पर्रिकर ने सभी धर्मों और वर्गों का भरोसा हासिल कियामिस्टर क्लीन, हाफ शर्ट वाले और स्कूटी वाले सीएम और न मालूम कितने ही अलग नामों से पर्सेकर गोवा ही नहीं वहां के बाहर भी पहचाने जाते थे।