कड़वी हकीकत से उपजे सवाल

सावधान! ताकत चाहे किसी भी स्तर की हो, उसका बेजा इस्तेमाल होता भयानक । प्रमिक पाउलो सितम के कई किस्से हमने देखे, सुने हैं। लेकिन संजीव की ताजा पुस्तक 'सावधान ! नीचे आग है' उन सब किस्सों से अलहदा है।खदान मजदूरों की जिंदगी कितनी कठिन होती है और उन व्यजीव कठिनाइयों पर चलते हए उन्हें जो तंज. जो दंश झेलने पड़ते हैं, उसकी बानगी इस किताब में है। मौत सिर पर हो और ये मजदूर घरवालों को मिलने वाले मुआवजे की सोच रहे हों, कल्पना कीजिए ऐसे मंजर का। किताब में एक जगह इसी तरह के मंजर का एक संवाद है, 'शालिगराम दुबे ने हाथ जोड़कर सबको प्रणाम किया, खड़े हुए और बोले, भूल-चूक छिमा! चला चली की बेर है कोई जिंदा रहा तो हमरा दूनो चेंगा सेवा और लेटी को माया लेना * गोगा मिलजल गाया कोनाली नैं देगाअचानक कुछ सोचकर सवाल पूछते हैं, कितना मुआवजा मिलेगा पोलीस भरती करते दिखते हैं तो कभी अमिक वर्ग की नियति पर आंग सान से लगते । परी किताब की एक-एक लाइन में लेखक ने दर्द और दिल में उसट रहे ज्वाला को सप्रयास दबाने की जो दास्तां पेश की है, वह बेहद खौफनाक है। रेट डेसी अंदाज के संवाद परेपकरणकोजीत करते हैं और रेखाचिर सा सामने खिंचता नजर आता है। सावधान। नोचआला है